शनिवार 26 सितंबर 2026 - 12:00
अल्लाह की मारफ़त इंसान को उसकी वास्तविक पहचान से परिचित कराती है: मौलाना फरमान हैदर नकवी

मदरसा इमाम-ए-अस्र, संगम विहार, वज़ीराबाद, नई दिल्ली में मौलाना फरमान हैदर नकवी ने शुक्रवार के खुतबे में ईश्वर की पहचान, बंदगी, तक़वा, शुक्र और अच्छे आचरण के महत्व पर प्रकाश डाला।

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी की रिपोर्ट के अनुसार, मदरसा इमाम-ए-अस्र, संगम विहार, वज़ीराबाद, नई दिल्ली में नमाज़-ए-जुमा के खुतबे को संबोधित करते हुए संगम विहार, दिल्ली के इमाम-ए-जुमा मौलाना फरमान हैदर नकवी ने अल्लाह की पहचान, बंदगी की वास्तविकता, नेमतों का शुक्र, तक़वा, विनम्रता और अच्छे आचरण के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यदि इंसान अपने रब को पहचान ले तो उसे अपनी वास्तविकता और जीवन के उद्देश्य का भी ज्ञान हो जाता है। इसके विपरीत, अल्लाह को भूल जाने वाला इंसान दुनिया की अनगिनत नेमतें हासिल करने के बावजूद अपने अस्तित्व के वास्तविक उद्देश्य से दूर हो सकता है।

उन्होंने खुतबे की शुरुआत इस मूल प्रश्न से की कि अल्लाह कौन है और मैं कौन हूं? मौलाना फरमान हैदर नकवी ने कहा कि इंसान को समझना चाहिए कि वह केवल शरीर, नाम, परिवार, पद, धन या कुछ वर्षों की जिंदगी का नाम नहीं है, बल्कि उसकी वास्तविक पहचान अल्लाह का बंदा होना है। कुरआन मजीद इंसान को याद दिलाता है कि अल्लाह बेनियाज़ है और सभी इंसान उसके मोहताज हैं। वह अज़ली और अबदी है, जबकि इंसान नश्वर है। वह सर्वशक्तिमान है, जबकि इंसान कमजोर और जरूरतमंद है।

उन्होंने अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अलैहिस्सलाम के कथन "أَوَّلُ الدِّينِ مَعْرِفَتُهُ" का हवाला देते हुए कहा कि धर्म की बुनियाद अल्लाह की पहचान पर कायम है। जब इंसान अपने रब को पहचान लेता है तो उसका ईमान मजबूत होता है, तौहीद में पुख्तगी आती है, इखलास नसीब होता है और उसके कर्म तथा चरित्र में बदलाव आता है। यदि हम अपनी नमाज़, नैतिकता, घरेलू जीवन, कारोबार, भाषा और समाज में सुधार चाहते हैं तो हमें अपने दिलों में अल्लाह की पहचान को जगह देनी होगी।

मौलाना फरमान हैदर नकवी ने अल्लाह की अनगिनत नेमतों की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इंसान अल्लाह की नेमतों को पूरी तरह गिन नहीं सकता। आंखें, सांस, दिल, माता-पिता का प्रेम, रोज़ी, बुद्धि, हिदायत, कुरआन मजीद, रसूले अकरम सल्लल्लाहु अलैहि व आलेहि वसल्लम और अहले-बैत अतहार अलैहिमुस्सलाम जैसी नेमतें अल्लाह की عطा हैं। एक नेमत का शुक्र अदा करने की कोशिश की जाए तो दूसरी नेमत सामने आ जाती है। उन्होंने अफसोस व्यक्त किया कि इंसान की जिंदगी अल्लाह की नेमतों से भरी हुई है, लेकिन उसकी ज़बान पर अक्सर शिकायतें रहती हैं। इसलिए हमें अपने अंदर शुक्रगुज़ारी की भावना पैदा करनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि अल्लाह खालिक है और इंसान मखलूक। इंसान को अपनी सेहत, धन, पद और ताकत को स्थायी संपत्ति नहीं समझना चाहिए, बल्कि उन्हें अल्लाह की عطा और अमानत समझना चाहिए, क्योंकि जिसने ये नेमतें दी हैं, वह एक दिन उनके इस्तेमाल के बारे में भी सवाल करेगा।

संगम विहार, दिल्ली के इमाम-ए-जुमा ने कहा कि इंसान की वास्तविक इज्जत अल्लाह की बंदगी में है। इस्लाम इंसान को यह शिक्षा देता है कि वह अल्लाह के अलावा किसी का गुलाम न बने; न धन का, न शोहरत का, न इच्छाओं का, न अहंकार का और न लोगों की खुशी का, बल्कि केवल अल्लाह का बंदा बने।

उन्होंने इबादत के वास्तविक अर्थ को स्पष्ट करते हुए कहा कि इबादत केवल नमाज़, रोज़ा, हज और दुआ तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव इंसान की पूरी जिंदगी में दिखाई देना चाहिए। यदि नमाज़ पढ़ने के बाद इंसान झूठ बोले, कुरआन पढ़ने के बाद अत्याचार करे या मजलिस में इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का ज़िक्र करने के बावजूद किसी कमजोर इंसान पर ज्यादती करे तो उसे अपने चरित्र और इबादत के प्रभावों की समीक्षा करनी चाहिए। वास्तविक इबादत वही है जो इंसान को अल्लाह के करीब और गुनाहों से दूर करे।

मौलाना फरमान हैदर नकवी ने कहा कि अल्लाह की याद केवल मस्जिद तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि बाजार, दुकान, कारोबार, घर, मोबाइल के इस्तेमाल और एकांत सहित जिंदगी के हर चरण में इंसान को यह एहसास होना चाहिए कि अल्लाह उसे देख रहा है। यही एहसास तक़वा की बुनियाद है। जब इंसान को यकीन हो जाता है कि अल्लाह उसके कर्मों से अवगत है तो वह हराम से अपना हाथ रोक लेता है, झूठ से अपनी ज़बान को सुरक्षित रखता है, गलत चीज़ देखने से अपनी आंखों को बचाता है, अत्याचार से दूर रहता है और कारोबार में धोखाधड़ी से बचता है।

उन्होंने कहा कि अल्लाह तआला ने मौत और जिंदगी को इंसान की परीक्षा के लिए पैदा किया, ताकि यह मालूम हो कि कौन बेहतर कर्म करता है। सफलता का मापदंड केवल धन, शोहरत और ताकत नहीं, बल्कि अच्छे कर्म और नेक चरित्र हैं। दुनिया यह पूछती है कि इंसान के पास क्या है, जबकि धर्म उसे इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि उसे जो कुछ मिला, उसने उसके साथ क्या किया।

संगम विहार के इमाम-ए-जुमा ने अहंकार के नुकसान बताते हुए कहा कि धन, ज्ञान, पद, परिवार, नस्ल या ताकत पर घमंड इंसान को वास्तविकता से दूर कर देता है। इंसान को अपनी असलियत याद रखनी चाहिए। कल वह मिट्टी था, आज चल-फिर रहा है और कल फिर मिट्टी में लौट जाएगा। इसके बाद उसे अल्लाह के सामने उपस्थित होना है।

उन्होंने कहा कि अल्लाह की पहचान का पहला प्रभाव विनम्रता है। यदि इंसान वास्तव में जानता है कि अल्लाह सबसे बड़ा है तो उसे खुद को बड़ा समझने की जरूरत नहीं। यदि हर सांस अल्लाह की عطा है तो घमंड कैसा? यदि ताकत अल्लाह की दी हुई है तो कमजोर इंसान को कुचलने का क्या औचित्य? और यदि रोज़ी का मालिक अल्लाह है तो हराम रास्ता अपनाने की जरूरत क्यों पड़े?

उन्होंने कहा कि अल्लाह की पहचान इंसान में विनम्रता पैदा करती है, विनम्रता अच्छे आचरण का कारण बनती है और अच्छा आचरण एक नेक समाज की बुनियाद प्रदान करता है।

खुतबे के अंत में मौलाना फरमान हैदर नकवी ने जिंदगी की नश्वरता की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि इंसान दुनिया में इस तरह जिंदगी गुजारता है जैसे उसे हमेशा यहीं रहना है, जबकि उसके आसपास के लोग एक-एक करके दुनिया से विदा हो रहे हैं। जिन लोगों के साथ कल हम उठते-बैठते थे, आज उनकी कब्रों पर फातिहा पढ़ रहे हैं और एक दिन दूसरे लोग हमारी कब्रों पर फातिहा पढ़ने आएंगे। उस समय न धन काम आएगा और न दुनिया की प्रशंसा, बल्कि इंसान के कर्म ही उसके साथ होंगे।

उन्होंने मोमिनों को नमाज़ मजबूत करने, दिल को पाक रखने, ज़बान की हिफाजत करने, माता-पिता को खुश रखने, मजलूम का साथ देने और अहले-बैत-ए-रसूल अलैहिमुस्सलाम की सीरत को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाने की नसीहत की। उन्होंने कहा कि इंसान अपने दिल में यह यकीन पैदा करे कि अल्लाह मुझे देख रहा है, मेरी बात सुन रहा है, मेरे हालात से वाकिफ है और एक दिन मुझे उसी के सामने लौटकर जाना है।

खुतबे के अंत में उन्होंने इस्लामी दुनिया, देश और राष्ट्र तथा मोमिनों की भलाई, सुरक्षा और सरबुलंदी के लिए दुआ की।

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